Tuesday, January 27, 2009

समाज का स्याह सच

ग्वालियर। समाज में अमीरी गरीबी के बीच हमेशा से गहरी खाई रही है। आज भी यह खाई पटी नही है, बल्कि और चौडी होती जा रही है। महज दस फीसदी लोगों के पास ही 90 फीसदी लोगों का पैसा है। कोई खा खा कर बीमार हो रहा है तो किसी को दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं हो पा रही है। अमीरों के पास पैसा खर्च करने की जगह नहीं है तो भूखों मर रहा है।


एक ऐसा ही नजारा यहाँ अचलेश्वर महादेव मन्दिर के पास में दिखा। किसी अमीर जादे के यहाँ कोई उत्सव था। खाने के बाद पत्तलों को घर के ही बाहर फ़ेंक दिया गया था। उस घर के पास ही भूक से बिलबिलाता एक गरीब जो कुछ विक्छिप्त सा लग रहा था खड़ा था। उसे उम्मीद थी की शायद किसी को रहम आ जाए और कुछ खाने को मिल जाए। जब उस गरीब की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया तो वह उन जूठे पत्तलों के पास गया और उसमें से ही कुछ खाने को तलाशने लगा। जब कुछ नही मिला तो उसका मन उदास हो गया। फिर वह खड़ा रहा। तब तक जूठे पत्तलों का दूसरा ढेर आ चुका था। वह फिर उनमें से कुछ खाने को तलासने लगा। इसबार उसे कुछ पूडियां और सब्जी मिल गयी। उसके चेहरे की खुशी देखते ही बन रही थी। यह वाकया देखने के बाद मेरा मन भर आया। समाज की इस दोहरी व्यवस्था पर बहुत दुःख हुआ।


लेकिन मेरा यह मानना नहीं है की, इसके लिए अमीर ही दोषी है। हम मध्य वर्गीय लोग भी कम जिम्मेदार नहीं है। हमारे पास थोड़ा सा पैसा होता है तो हम शाहखर्च बन जाते हैं। अमीर लोग भी अगर अपने शाहखर्ची पर थोड़ा सा विराम लगा दें तो पूरे दुनिया से गरीबी मिट जाए। हम सभी लोगों को शाहखर्ची से बचना चाहिए। हमारा तो यही मानना है आपका क्या मानना है.

Sunday, January 18, 2009

दर्द को दिल से निकलने का बहाना मिल जाये,खुल के रो लूं जो मुझे भी कोई साना मिल जाये,उनके कूचे की तरफ निकल तो दिए हैं मगर,कहीं ऐसा न हो कि जमाना मिल जाये.ये बात अलग है कि तुम ना बदले,मगर जमाना बदल रहा है.गुलाब पत्थर पर खिल रहे हैं,चराग आंधी में जल रहे हैं.