Monday, February 2, 2009

शेर

तमन्ना फिर मचल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ.ये मौसम फिर बदल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ,अभी तो सब मेरे हमदम से लगते हैं,जमाना मुझसे जल जाये अगर तुम मिलने आ जाओ.

Tuesday, January 27, 2009

समाज का स्याह सच

ग्वालियर। समाज में अमीरी गरीबी के बीच हमेशा से गहरी खाई रही है। आज भी यह खाई पटी नही है, बल्कि और चौडी होती जा रही है। महज दस फीसदी लोगों के पास ही 90 फीसदी लोगों का पैसा है। कोई खा खा कर बीमार हो रहा है तो किसी को दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं हो पा रही है। अमीरों के पास पैसा खर्च करने की जगह नहीं है तो भूखों मर रहा है।


एक ऐसा ही नजारा यहाँ अचलेश्वर महादेव मन्दिर के पास में दिखा। किसी अमीर जादे के यहाँ कोई उत्सव था। खाने के बाद पत्तलों को घर के ही बाहर फ़ेंक दिया गया था। उस घर के पास ही भूक से बिलबिलाता एक गरीब जो कुछ विक्छिप्त सा लग रहा था खड़ा था। उसे उम्मीद थी की शायद किसी को रहम आ जाए और कुछ खाने को मिल जाए। जब उस गरीब की तरफ़ किसी का ध्यान नहीं गया तो वह उन जूठे पत्तलों के पास गया और उसमें से ही कुछ खाने को तलाशने लगा। जब कुछ नही मिला तो उसका मन उदास हो गया। फिर वह खड़ा रहा। तब तक जूठे पत्तलों का दूसरा ढेर आ चुका था। वह फिर उनमें से कुछ खाने को तलासने लगा। इसबार उसे कुछ पूडियां और सब्जी मिल गयी। उसके चेहरे की खुशी देखते ही बन रही थी। यह वाकया देखने के बाद मेरा मन भर आया। समाज की इस दोहरी व्यवस्था पर बहुत दुःख हुआ।


लेकिन मेरा यह मानना नहीं है की, इसके लिए अमीर ही दोषी है। हम मध्य वर्गीय लोग भी कम जिम्मेदार नहीं है। हमारे पास थोड़ा सा पैसा होता है तो हम शाहखर्च बन जाते हैं। अमीर लोग भी अगर अपने शाहखर्ची पर थोड़ा सा विराम लगा दें तो पूरे दुनिया से गरीबी मिट जाए। हम सभी लोगों को शाहखर्ची से बचना चाहिए। हमारा तो यही मानना है आपका क्या मानना है.

Sunday, January 18, 2009

दर्द को दिल से निकलने का बहाना मिल जाये,खुल के रो लूं जो मुझे भी कोई साना मिल जाये,उनके कूचे की तरफ निकल तो दिए हैं मगर,कहीं ऐसा न हो कि जमाना मिल जाये.ये बात अलग है कि तुम ना बदले,मगर जमाना बदल रहा है.गुलाब पत्थर पर खिल रहे हैं,चराग आंधी में जल रहे हैं.

Thursday, August 14, 2008

पॉलिटिक्स बिसिनेस हो गया है

शाम का समय था मैं दफ्तर के लिए लेट हो रहा था। सरपट चला जा रहा था। इतने में देखता हूँ की सड़क के किनारे एक मंच पर कुछ लोग नेता के वेशभूषा मैं बैठे हैं। मौका था उत्तरप्रदेश की जलेषर विधान सभा से संसद एस पी बघेल के बसपा में शामिल होने के जश्न का। नेता vahee पर partee बदल गई। विचारधारा बदल गई। कल तक जिसे पूजते थे अब उनको देखना तक नहीं चाहते। मंच पर महापुरुषों की तस्वीरें भी बदल गईं। जहाँ पहले मंच पर लोहिया, मुलायम, शिवपाल यादव की तस्वीरें हुआ करतीं थीं अब वहीं उनकी जगह पर आंबेडकर, कांसी राम और मायावती ने ले लिया था।sochne
ka visay hai ki ऐसा एक ही रात में क्या हो गया की समाजवाद से राजनीती का ककहरा पड़ने वाले की रातो रात राजनीतिक विचारधारा बदल गई दरअसल आज के राजनेताओं की कोई विचारधारा ही नही रह गई है। अब तो राजनेता अपना व्यक्तिगत स्वार्थ साधने में लगे हैं। जहाँ लाभ का पद मिला वही दोना उठाये चल दिए।चाटने। एस पी बघेल ने भी वही किया। मुलायम ने बघेल को एक दरोगा से सांसद बनाया और अब उनहोंने बसपा का दमन थाम लिया। कहने का तात्पर्य अब राजनीती का मकसद जन सेवा नहीं बल्की आत्म सेवा रह गई है।

Thursday, January 31, 2008

तारे जमीन पर

हल ही में मैंने मशहूर फिल्म अभिनेता आमिर खान द्वारा अभिनीत और निर्देशित फिल्म तारे जमीन पर देखी। मुझे यह कहने में तनिक भी हिचक नहीं है कि गंभीर ज्वलंत सामाजिक मुद्दों पर बनी यह फिल्म अपने आप में बेमिशाल है। इस फिल्म में मासूमों पर माता पिता की अपेछाएं कैसे हावी हैं इसे बखूबी और बडे ही मार्मिक रुप से पेश किया है। आज विद्यालयों में आसानी से देखा जा सकता है कि मानसिक रुप से कमजोर बच्चों को किस तरंह प्रताडित किया जाता है। इसमें न सिर्फ टीचर शामिल हैं बल्कि खुद माता पिता भी बराबर के दोषी हैं। आज यह एक जवालंत समस्या है। इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

Monday, November 26, 2007

आखिर तसलीमा को निर्वासन क्यों

बांग्लादेश की विवादास्पद लेखिका तसलीमा नसरीन इस समय देश कि मीडिया में छाई हुई हैं। बांग्लादेश से निकाले जाने के बाद उन्हें भारत मैं शरण मिली। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि उन्हें यहाँ भी कुछ तथाकथित चरमपंथी नहीं रहने दे रहें हैं। मुझे एक बात समझ में नही आती है कि ये चरमपंथी आखिर ऐसा क्यों का रहे हैं।
नसरीन न तो कोई आतंकवादी हैं और न उनहोंने अभी तक ऐसा कोई कम किया है जिससे मुस्लिम समुदाय के ठेकेदारों को कोई समस्या हो । लज्जा उपन्यास में भी उन्होंने एसी कोई बात नहीं लिखी है जिसे लेकर मुस्लिम समुदाय के ठहेदार हो हल्ला कर रहें हैं।
तसलीमा को लेकर देश के राजनेता जो राजनीत कर रहें है वह भी दुर्भाग्यपूर्ण है। देश में आतंकवाद चरम पर है, रोज बम धमाके हो रहे हैं, भूख से रोज किसानों की मौतें हो रही हैं, बेरोजगारी चरम पर है, नंदीग्राम जल रह है, आम आदमी असुरछित महसूस कर रहा है इनसबकी चिंता इनको नही है. पत्रकारों पर हमले हो रहे हैं। अभी बिहार मैं अनंत सिंह के खिलाफ चलाये गए आपरेशन में पत्रकारों के खिलाफ हुए हमले इसका जिताजागता उदाहरण है। ये राजनेता मीडिया की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अपनी मुट्ठी मैं बंद कर लेना चाहते हैं, ताकि इनके द्वारा किए जा रहे कुकर्मों का खुलासा न हो सके।
मेरा मानना है कि तसलीमा को भारत में न सिर्फ शरण मिले बल्कि भारत कि नागरिकता दी उनहोंने नागरिकता के लिए आवेदन भी किया है। तसलीमा के सिर्फ भारत में ही नही बल्कि समूचे विश्व में प्रशंसक हैं जो उनकी रचनाओं के दीवाने हैं। ऐसे में सिर्फ चंद विरोधिओं के खातिरउनपर ऐसा जुर्म क्यों। एक लेखक को अगर इतने बडे संसार में पनाह न मिले तो यह निहायत शर्म कि बात है।